संक्षिप्त रामायण रामायण काव्य पाठ (झटपट रामायण)
राम शिकार के पीछे जाएँ, मृग ने की भारी पुकार;
“लक्ष्मण! मेरी रक्षा करना”, सीता जी व्याकुल लाचार।
किए सिया ने शब्द-प्रहार, लक्ष्मण-रेखा हुई तैयार;
लक्ष्मण प्रभु की खोज में जाएँ, रावण सीता को हर जाए।
भक्त जटायु रक्षा को आए, रावण हाथों पंख कटाए;
मुक्ति दीनी श्री रघुराई, फिर सुग्रीव से मित्रता पाई।
वाली-भूप का किया विनाश, प्रभु पधारे शबरी पास;
शबरी के प्रभु जूठे बेर खाएँ, मुनियों के अभिमान मिटाएँ।
सीता-हरण की जानी बात, बीड़ा उठाया वीर हनुमान;
पवनवेग से लंका जाएँ, विभीषण से तब भेंट रचाएँ।
अशोक-वाटिका में पहुँच जाएँ, सीता माँ के चरण नवाएँ;
लंका जलाई, लाए सार, बाँधा सेतु समंदर पार।
राम-रावण का युद्ध छिड़ जाए, महा भयंकर रण सज जाए;
रावण क्रंदन करे अपार, कुंभकर्ण का शीश उतार।
मेघनाद जब रण में आए, लक्ष्मण मूर्छित भूमि पर पाए;
बजरंगी संजीवन लाएँ, लखन लला फिर जीवन पाएँ।
दशानन का प्रभु काटें शीश, गूँजा जय-जयकार विशेष;
धोबी ने जब लांछन लगाया, राम ने सीता-त्याग कराया।
वाल्मीकि ऋषि-आश्रम माहिं, लव-कुश जनमे, सुख बरसाईं;
अश्वमेध जब यज्ञ रचाया, तुरंगम तरु से बाँध गिराया।
लव-कुश से सब भूप पराए, हार मान सब शीश नवाएँ;
राम अवध से रण में आए, सुत संग युद्ध का योग बनाए।
सीता माँ ने जानी बात, बीच समर में आई मात;
जब सम्मुख पहचान हो जाए, पिता-पुत्र सब कंठ लगाए।
सीता भू-गर्भ समाईं, प्रभु-लीला तब पूर्ण कराई;
राम-भक्त जो गाए यह पाठ, संकट में प्रभु थामें हाथ।
॥ बोलो सियावर रामचंद्र की जय ॥
॥ पवनसुत हनुमान की जय ॥
- सीता हरण और प्रभु का विलाप: कथा की शुरुआत मारीच (कपट के हिरण) के रोने से होती है। रावण सीता माता का हरण करता है और वृद्ध जटायु निडरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होते हैं।
- शबरी पर कृपा और सुग्रीव की मित्रता: भगवान राम शबरी के प्रेम में डूबे हुए झूठे बेर खाते हैं, जो यह सिखाता है कि ईश्वर केवल प्रेम के वश में हैं। इसके बाद सुग्रीव से मित्रता होती है और बाली का उद्धार होता है।
- वीर हनुमान का लंका दहन: संकटमोचन हनुमान जी लंका जाकर विभीषण से मिलते हैं, माता सीता को प्रभु की मुद्रिका देते हैं और रावण के अहंकार को कुचलने के लिए लंका में आग लगा देते हैं।
- राम-रावण युद्ध और विजय: लंका में ऐतिहासिक युद्ध छिड़ता है। कुंभकर्ण और मेघनाद जैसे महायोद्धा मारे जाते हैं। लक्ष्मण जी के मूर्छित होने पर हनुमान जी पहाड़ उठाकर संजीवन बूटी लाते हैं। अंत में रावण का वध कर धर्म की स्थापना होती है।
- लव-कुश का जन्म और अश्वमेध यज्ञ: अयोध्या लौटने के बाद, सामाजिक मर्यादा के कारण सीता जी का त्याग होता है। वाल्मीकि आश्रम में जन्मे तेजस्वी बालक लव और कुश श्री राम के अश्वमेध घोड़े को रोककर बड़े-बड़े राजाओं को परास्त कर देते हैं।
- कथा की पूर्णाहुति: अंत में जब श्री राम को अपने पुत्रों की पहचान होती है, तब भावुक मिलन होता है। माता सीता अपनी मर्यादा रखते हुए धरती माता की गोद में समा जाती हैं और प्रभु की यह अलौकिक लीला समाप्त होती है।

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